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Meta Description: नीतीश News: नीतीश की राज्यसभा की राह कितनी मुश्किल: 5वें उम्मीदवार को जिताने का क्या गणित, कहां फंस सकता है एनडीए? – जानिए क्या है पूरा मामला और ताजा अपडेट्स।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर राज्यसभा में चुनाव कैसे होता है? बिहार से कितनी सीटें दांव पर हैं? इन सीटों पर नीतीश कुमार के अलावा कौन-कौन दावेदारी ठोक रहा है? राज्यसभा सीट जीतने के लिए क्या समीकरण है? आइये जानते हैं… विज्ञापन विज्ञापन 16 मार्च को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है। देशभर में राज्यसभा की कुल 37 सीटों पर चुनाव होने हैं। इनके लिए महाराष्ट्र से लेकर असम और तमिलनाडु से लेकर बंगाल तक की राज्यसभा सीटें हैं। हालांकि, बिहार में हुए एक हालिया घटनाक्रम ने इन चुनावों में लोगों की दिलचस्पी बढ़ा दी है। दरअसल, बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने संसद के उच्च सदन के चुनाव के लिए नामांकन कर दिया है।
नीतीश: घटना का पूरा विवरण
राज्यसभा चुनाव कैसे होता है? राज्यसभा में किस राज्य से कितने सांसद होंगे यह उस राज्य की जनसंख्या के हिसाब से तय होता है। राज्यसभा के सदस्य का चुनाव उस राज्य की विधानसभा के चुने हुए विधायक करते हैं, जिस राज्य से वह उम्मीदवार है। राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया लोकसभा और विधानसभा चुनाव से काफी अलग है, क्योंकि इस सदन के लिए मतदान सीधे जनता नहीं करती, बल्कि जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि करते हैं। राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल छह साल का होता है। राज्यसभा चुनावों के नतीजों के लिए एक फॉर्मूला भी तय किया गया है।
चुनाव नतीजों का ये फॉर्मूला क्या है?
जिस राज्य की राज्यसभा सीट के लिए चुनाव हो रहे हैं, उस राज्य के विधायक इसमें वोट डालते हैं। इन चुनाव में लोकसभा और विधानसभा चुनाव की तरह वोट नहीं पड़ते। यहां विधायकों को वरीयता के आधार पर वोट डालना होता है।
नीतीश: निष्कर्ष और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी
ये भी पढ़ें: क्या है नीतीश कुमार का इतिहास: परिवार में कौन-कौन, सियासी सफर कैसा? जानें उनसे जुड़े सभी सवालों के जवाब राज्यसभा में किस राज्य से कितने सांसद होंगे यह उस राज्य की जनसंख्या के हिसाब से तय होता है। राज्यसभा के सदस्य का चुनाव उस राज्य की विधानसभा के चुने हुए विधायक करते हैं, जिस राज्य से वह उम्मीदवार है। राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया लोकसभा और विधानसभा चुनाव से काफी अलग है, क्योंकि इस सदन के लिए मतदान सीधे जनता नहीं करती, बल्कि जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि करते हैं। राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल छह साल का होता है। राज्यसभा चुनावों के नतीजों के लिए एक फॉर्मूला भी तय किया गया है।जिस राज्य की राज्यसभा सीट के लिए चुनाव हो रहे हैं, उस राज्य के विधायक इसमें वोट डालते हैं। इन चुनाव में लोकसभा और विधानसभा चुनाव की तरह वोट नहीं पड़ते। यहां विधायकों को वरीयता के आधार पर वोट डालना होता है।
विधायकों को चुनाव आयोग की ओर से एक विशेष पेन दिया जाता है। उसी पेन से उम्मीदवारों के आगे वोटर को नंबर लिखने होते हैं। एक नंबर उसे सबसे पसंदीदा उम्मीदवार के नाम के आगे डालना होता है। ऐसे दूसरी पसंद वाले उम्मीदवार के आगे दो लिखना होता है। इसी तरह विधायक चाहे तो सभी उम्मीदावारों को वरीयता क्रम दे सकता है। अगर आयोग द्वारा दी गई विशेष पेन का इस्तेमाल नहीं होता तो वह वोट अमान्य हो जाता है। इसके बाद विधानसभा के विधायकों की संख्या और राज्यसभा के लिए खाली सीटों के आधार पर जीत के लिए आवश्यक वोट तय होते हैं। जो उम्मीदवार उस आवश्यक संख्या से अधिक वोट पाता है वह विजयी घोषित होता है। बिहार कैसे तय करेगा अपने राज्यसभा सांसद? बिहार में विधायकों की कुल संख्या 243 है। इस बार राज्य की कुल पांच राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हो रहा है। हर एक सदस्य को राज्यसभा पहुंचने के लिए कितने विधायकों का समर्थन प्राप्त होना चाहिए इसके लिए एक तय फॉर्मूला है। यह फॉर्मूला यह है कि कुल विधायकों की संख्या को जितने राज्यसभा सदस्य चुने जाने हैं, उसमें एक जोड़कर विभाजित किया जाता है।
बिहार में किन सांसदों की सीटें हो रहीं खाली? इस बार यहां से पांच राज्यसभा सदस्यों का चुनाव होना है। इसमें एक जोड़ने से यह संख्या छह होती है। अब कुल सदस्य 243 हैं तो उसे छह से विभाजित करने पर 40.5 आता है। इसमें एक जोड़ने पर यह संख्या 41.5 हो जाती है। यानी बिहार से राज्यसभा सांसद बनने के लिए उम्मीदवार को 41 प्रथम वरीयता के वोटों की जरूरत होगी। अगर विजेता का फैसला प्रथम वरीयता के वोटों से नहीं होता तो उसके बाद दूसरी वरीयता के वोट गिने जाते हैं।
किसकी उम्मीदवारी में कितना दम? बिहार में मौजूदा समय में भाजपा के पास सबसे ज्यादा 89 सीटें हैं, जबकि 85 सीटों के साथ जदयू दूसरे नंबर पर है। मौजूदा समीकरण के मुताबिक, सत्ताधारी गठबंधन चार सीटें आसानी से जीत सकता है। वहीं, पांचवीं सीट पर एनडीए का दावा महागठबंधन के मुकाबले ज्यादा मजबूत दिखाई दे रहा है।
बिहार में मौजूदा समय में भाजपा के पास सबसे ज्यादा 89 सीटें हैं, जबकि 85 सीटों के साथ जदयू दूसरे नंबर पर है। मौजूदा समीकरण के मुताबिक, सत्ताधारी गठबंधन चार सीटें आसानी से जीत सकता है। वहीं, पांचवीं सीट पर एनडीए का दावा महागठबंधन के मुकाबले ज्यादा मजबूत दिखाई दे रहा है।
इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। भाजपा को नितिन नवीन और शिवेश कुमार को राज्यसभा में भेजने के लिए 41-41 प्रथम वरीयता के वोटों की जरूरत होगी। पार्टी के पास 89 सीटें हैं। यानी उसके 82 विधायक ही नितिन नवीन और शिवेश कुमार के लिए वोट कर के उन्हें राज्यसभा भेज सकते हैं। यानी भाजपा के पास सात प्रथम वरीयता के वोट फिर भी बाकी रहेंगे, जिसका इस्तेमाल पार्टी अपने किसी सहयोगी को जिताने के लिए कर सकती है।
कुछ इसी तरह की स्थिति जदयू के साथ भी है। पार्टी से इस बार हरिवंश नारायण की जगह नीतीश कुमार उम्मीदवार हैं। इसके अलावा कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर भी राज्यसभा के लिए दावेदारी पेश कर रहे हैं। जदयू के पास 85 सीट हैं और वह आसानी से अपने दोनों उम्मीदवारों को राज्यसभा पहुंचा सकती है। यानी उसके पास भी तीन प्रथम वरीयता के वोट बचेंगे।
यानी स्पष्ट है कि भाजपा और जदयू आसानी से अपने नेताओं को राज्यसभा पहुंचा देंगी। इस लिहाज से नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने में कोई अड़चन नहीं दिखती।
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