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Meta Description: मुंबई News: मुंबई झुग्गी पुनर्वास विवाद: राज्य सरकार-MCGM को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, हाईकोर्ट के आदेश को बताया चुनौतीपूर्ण – जानिए क्या है पूरा मामला और ताजा अपडेट्स।
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मुंबई: मुख्य समाचार और अपडेट
मुंबई: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महाराष्ट्र सरकार, मुंबई नगर निगम (MCGM) और झुग्गी पुनर्वास प्राधिकरण सहित अन्य पक्षकारों से बॉम्बे हाईकोर्ट के विवादास्पद आदेश के खिलाफ याचिका पर जवाब मांगा। यह याचिका उन प्लॉट्स पर पुनर्वास योजनाओं को चुनौती देती है, जो मूल रूप से पार्क, उद्यान और खेल मैदान के लिए आरक्षित थे।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 19 जून 2025 को डीसीपीआर 2034 के रेगुलेशन17(3)(डी)(2) को वैध ठहराते हुए कहा था कि यह नियम उपनगरीय झुग्गी पुनर्वास योजनाओं को लागू करने की अनुमति देता है, बशर्ते जनता के लिए एक हिस्से को पुनः हरित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह संतुलन मुंबई की हरित आवरण आवश्यकता और आवास के संवैधानिक अधिकार के बीच है।सुप्रीम कोर्ट की बेंच चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची ने वरिष्ठ वकील श्याम दिवान के तर्कों को नोट किया। दिवान उन लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे जिन्होंने हाईकोर्ट में पीआईएल दाखिल की थी। उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश पर सवाल उठाते हुए कहा कि मुंबई में खुले सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा जरूरी है। हाईकोर्ट की बेंच ने हालांकि नियम की वैधता को स्वीकार करते हुए 17-सूत्रीय सख्त दिशानिर्देश जारी किए ताकि वादित खुली जगहें केवल कागज पर न रहकर वास्तविक, सार्वजनिक रूप से सुलभ सुविधाएं बनें।पीआईएल में दावा किया गया था कि आरक्षित खुली जगहों के 65 प्रतिशत पर निर्माण की अनुमति देना अतिक्रमण को वैध बनाना है और यह ‘पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन’ का उल्लंघन करता है। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह एक संवैधानिक संतुलन है क्योंकि ये प्लॉट वर्तमान में झुग्गियों से पूरी तरह भरे हैं और सामान्य जनता के लिए उपयोगी नहीं हैं।हाईकोर्ट ने कहा था कि 65:35 के व्यावहारिक संतुलन, जिसमें 35 प्रतिशत भूमि जनता के लिए हरित क्षेत्र के रूप में सुरक्षित रहती है और 65 प्रतिशत भूमि झुग्गी निवासियों के लिए इस्तेमाल होती है, सटीक और अनुपातिक समाधान है। इसके तहत भूमि का विकास जॉगिंग ट्रैक, लैंडस्केपिंग और खेल उपकरण के साथ होना चाहिए और इसे केवल पुनर्वास भवन के निवासियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में आरक्षित भूमि पर कोई नया अतिक्रमण नहीं होना चाहिए। इस मामले की लंबी कानूनी लड़ाई 2002 में शुरू हुई थी, जब 1992 की नीति को चुनौती दी गई थी, जो आरक्षित साइटों पर पुनर्विकास की अनुमति देती थी यदि वे 25 प्रतिशत तक अतिक्रमित हों।
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