स्मृति शेष: पत्रकार नहीं बनना चाहते थे सर विलियम मार्क टुली, पादरी बनने की थी ख्वाहिश; भारत से था गहरा रिश्ता

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स्मृति शेष: पत्रकार नहीं बनना चाहते थे सर विलियम मार्क टुली, पादरी बनने की थी ख्वाहिश; भारत से था गहरा रिश्ता: ताजा अपडेट

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स्मृति: मुख्य समाचार और अपडेट

स्मृति: सर विलियम मार्क टुली कभी पत्रकार नहीं बनना चाहते थे। उनकी दिली ख्वाहिश थी, कि वे एक पादरी बने। एक साक्षात्कार के दरमियान उन्होंने कहा कि मैं कैम्ब्रिज गया, क्योंकि मैं प्रीस्ट बनना चाहता था। इसी कारण से मैंने थियोलॉजी और हिस्ट्री में डिग्री भी ली लेकिन मैं वो बन नहीं पाया। मुझे हैरानी हुई कि मेरी किस्मत पत्रकारिता में है। शुरुआत के चार साल तक टुली ने एक एनजीओ के लिए काम किया और फिर 1964 में वे बीबीसी में शामिल हो गए। वहां टुली एक जर्नलिस्ट के तौर पर नहीं बल्कि मिडिल सीनियरिटी के पर्सनल मैनेजर के तौर पर शामिल हुए थे। इसी बीच अगले ही साल यानी 1965 में उन्हें अचानक नई दिल्ली में जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव असिस्टेंट के तौर पर काम करने का मौका मिला।

एक मीडिया साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि मेरे दादा का जन्म औरंगाबाद में हुआ था। मेरी मां का जन्म बांग्लादेश में हुआ था और मेरा जन्म कलकत्ता में हुआ था। मैंने हमेशा सोचा है कि भारत से मेरे जुड़ाव का एक कारण नियति है। मेरा भारत से जुड़ना तय था और मैंने हमेशा महसूस किया है कि मैं यहीं का हूं। लेकिन साथ ही, अगर आपने ब्रिटेन में राष्ट्रीय सेवा की है। अगर आप कैम्ब्रिज जैसे विश्वविद्यालय में पढ़े हैं। अगर आप मेरे जैसे पब्लिक स्कूल में पढ़े हैं, तो आप इन सब बातों को भुलाकर यह नहीं कह सकते कि आप भारतीय बन गए हैं। इसलिए, मैं कहना चाहूंगा कि मुझे लगता है कि मुझमें भारत का कुछ अंश अवश्य है।1975 की इमरजेंसी के दौरान, टुली को द गार्डियन और द वाशिंगटन पोस्ट सहित 40 विदेशी कॉरेस्पोंडेंट के साथ देश से निकाल दिया गया और वह लंदन वापस आ गए। जब इमरजेंसी खत्म हुई, तो वह चीफ ऑफ ब्यूरो के तौर पर वापस आ गए। इसके बाद उन्होंने “नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया” और “इंडिया इन स्लो मोशन” जैसी कुछ दिलचस्प किताबें लिखी हैं। कहा जाता है, कि मार्क टुली ने भारत में हुए कई अहम और बड़े बदलाव के दौरान रिपोर्टिंग की थी। इनमें 1975 में इंदिरा गांधी के आपातकाल लगाने के फैसले की जब मार्क टुली ने आलोचना की तो सरकार ने उन्हें भारत छोड़ने का आदेश दे दिया। जिसके बाद टुली कुछ समय के लिए दोबारा भारत आए। इसी तरह जब 1977 में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने और 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो उस समय भी टुली ने अहम रिपोर्टिंग की। वहीं, आगे चलकर भारत सरकार ने उन्हें 1992 में पद्म श्री और 2005 में पद्म भूषण से सम्मानित किया, जो चौथे और तीसरे सबसे बड़े सिविलियन अवॉर्ड हैं। ब्रॉडकास्टिंग में उनकी सेवाओं के लिए 2002 में बकिंघम पैलेस में प्रिंस चार्ल्स ने उन्हें नाइट की उपाधि दी थी।बता दें कि बीते रविवार को दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। डॉक्टरों के अनुसार, दोपहर 2 बजकर 35 मिनट पर बहु-अंग विफलता के कारण उनके शरीर ने उनका साथ छोड़ दिया। उन्होंने 30 वर्ष की अवधि तक बीबीसी के लिए कार्य किया था। 20 वर्ष तक बीबीसी के दिल्ली स्थित ब्यूरो के अध्यक्ष पद को संभाला। 1994 के बाद से वे नई दिल्ली से एक स्वतंत्र पत्रकार और प्रसारक के रूप में कार्य करने लगे। इसके बाद वे बीबीसी रेडियो 4 के साप्ताहिक कार्यक्रम समथिंग अंडरस्टुड के नियमित प्रस्तुतकर्ता रहे।

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