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Meta Description: Lakhimpur News: Lakhimpur Kheri News: अस्तित्व के संकट से जूझ रहा ओयल का पीतल कारोबार – जानिए क्या है पूरा मामला और ताजा अपडेट्स।
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Lakhimpur: मुख्य समाचार और अपडेट
Lakhimpur: लखीमपुर खीरी। ओयल कभी अपनी चमकदार पीतल कारीगरी के लिए पहचाना जाता था। शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर सीतापुर मार्ग पर बसा यह कस्बा एक समय पीतल नगरी के नाम से मशहूर था। यहां बनने वाले बटुआ, लोटा, कटोरा, चिमचा, गगरी और करवा जैसे पारंपरिक बर्तन आसपास ही नहीं, बल्कि प्रदेश के कई जिलों तक भेजे जाते थे।समय के साथ हालात ऐसे बदले कि कभी हर घर में गूंजने वाली हथौड़ों की आवाज अब लगभग खामोश हो चुकी है। सरकारी प्रोत्साहन के अभाव, बढ़ती महंगाई, कच्चे माल की समस्या और आधुनिक फाइबर व स्टील के बर्तनों की बढ़ती मांग ने ओयल के पीतल कारोबार को अस्तित्व के संकट में ला खड़ा किया है। पुस्तैनी काम करने वाले कारीगर भी अब इस कारोबार को जिंदा रख पाने में असमर्थता जता रहे हैं। संवादहर घर में था कारखाना, अब गिनती के बचे कारीगरएक दौर था जब ओयल के लगभग हर घर में छोटा-बड़ा कारखाना चलता था। परिवार के सदस्य मिलकर बर्तन बनाते और व्यापारी उन्हें आसपास के जिलों में बेचने ले जाते थे। बड़ी लाइन बनने से पहले यहां रेलवे स्टेशन भी था, जिससे कच्चा माल लाना और तैयार माल भेजना आसान था। अब न तो स्टेशन की सुविधा है और न ही वह रफ्तार, कारोबार सिमटकर कुछ गिने-चुने घरों तक रह गया है।महंगाई और फाइबर बर्तनों ने तोड़ी कमरपीतल के दामों में लगातार बढ़ोतरी से लागत कई गुना बढ़ चुकी है। वहीं बाजार में सस्ते फाइबर और स्टील के बर्तनों की उपलब्धता ने पारंपरिक पीतल बर्तनों की मांग आधी से भी कम कर दी है। पहले जो पचहड़ (बटुआ, कटोरा, चिमचा, लोटा, थारा) हर घर की जरूरत हुआ करते थे, आज लोग उन्हें खरीदने से कतराते हैं।फोटो: 29छोटे व्यापारियों को सरकार की ओर से छूट मिलनी चाहिए। आए दिन पुलिस हमारे माल वाहनों को रोक लेती है, जबकि इसके लिए सेल्स टैक्स विभाग तैनात है। पहले रेलवे स्टेशन था, जिससे व्यापार सुरक्षित और सुगम था। बड़ी लाइन बनने के बाद वह सुविधा भी खत्म हो गई।- राम सिंह, मोहल्ला बगिया कारोबारीफोटो: 30मैं 1993 में मुरादाबाद ट्रेनिंग के लिए गया था। कई बार वित्तीय सहायता के लिए आवेदन किया, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। पहले रेल से कच्चा माल आता था और तैयार माल पूरनपुर, पीलीभीत, शाहजहांपुर, बहराइच, गोंडा, बाराबंकी, महमूदाबाद और लखनऊ तक भेजा जाता था। अब सुविधाएं खत्म हो गई हैं, जिससे व्यापार ठप पड़ गया है।- कैलाश नाथ, बर्तन कारीगरफोटो: 31हमारे परिवार में यह काम पीढ़ियों से होता आया है। अब कोयले की व्यवस्था भी ठीक नहीं है। सरकार की ओर से न सहायता मिलती है, न प्रशिक्षण। पहले सिधौली, कमलापुर, पीलीभीत, लखनऊ, बाराबंकी, फतेहपुर और सूरतगंज तक माल जाता था, अब बाजार सिमट गया है।अन्नू लाल कसेरा, पुश्तैनी कारोबारीफोटो: 32हमारे पुश्तैनी बर्तन व्यापार को सरकार से किसी प्रकार का प्रोत्साहन या वित्तीय सहायता नहीं मिल रही। व्यापार को आधुनिक तरीके से करने की कोई ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि लागत निकलना भी मुश्किल हो गया है। मांग आधी से भी कम रह गई है।- सत्यम सिंह, पीतल कारोबारी
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