Supreme Court: ‘विशेषज्ञों से सलाह लें’, ब्लड बैंकों में न्यूक्लिक एसिड परीक्षण अनिवार्य करने की मांग पर कोर्ट

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Supreme Court: 'विशेषज्ञों से सलाह लें', ब्लड बैंकों में न्यूक्लिक एसिड परीक्षण अनिवार्य करने की मांग पर कोर्ट: ताजा अपडेट

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चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच सुनवाई कर रही थी। याचिका सर्वेशम मंगलम फाउंडेशन की ओर से दायर की गई थी। बेंच ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह इस मुद्दे पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य विभागों के सचिवों को एक प्रेजेंटेशन दें। बेंच ने कहा कि स्वास्थ्य सचिव विशेषज्ञों की मदद और सलाह लेकर इस विषय पर उचित फैसला ले सकते हैं। विज्ञापन विज्ञापन

Supreme: घटना का पूरा विवरण

सुनवाई के दौरान सीजेआई ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, क्या आपको लगता है कि जनहित याचिकाओं (पीआईएल) को विदेश से फंडिंग नहीं मिलती? क्या आप ऐसा सोचते हैं? शीर्ष कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को संबंधित सरकारी अधिकारियों के पास जाकर अपनी बात रखनी चाहिए। सीजेआई सूर्य कांत ने कहा, हम इस विषय के विशेषज्ञ नहीं हैं, फिर हम क्यों यह दिखावा करें कि हमें चिकित्सा विज्ञान आता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ब्लड बैंकों में कौन-सा परीक्षण किया जाना चाहिए, इसका फैसला क्षेत्र के विशेषज्ञ ही कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि इस विषय में विशेष ज्ञान न होने के कारण वह याचिका में मांगे गए निर्देश जारी नहीं कर सकती। बेंच ने यह भी कहा कि याचिका में जो राहत मांगी गई है, उससे वित्तीय बोझ भी पड़ेगा और हर राज्य की अपनी आर्थिक सीमाएं होती हैं।

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इससे पहले 25 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में और जानकारी मांगी थी। कोर्ट ने पूछा था कि पूरे देश के सरकारी अस्पतालों में एनएटी परीक्षण कराने की लागत कितनी होगी और क्या यह सुविधा उपलब्ध है। यह परीक्षण एचआईवी और हेपेटाइटिस जैसे ट्रांसफ्यूजन से फैलने वाले संक्रमणों का पता लगाने के लिए किया जाता है।

Supreme: निष्कर्ष और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी

बेंच ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ए वेलन से कहा था कि वे यह भी बताएं कि एनएटी परीक्षण कराने में कितना खर्च आएगा और क्या सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा मौजूद है, ताकि गरीब लोग भी इसका लाभ उठा सकें। इस याचिका में ‘सर्वेशम मंगलम फाउंडेशन’ने केंद्र सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार बनाया था।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच सुनवाई कर रही थी। याचिका सर्वेशम मंगलम फाउंडेशन की ओर से दायर की गई थी। बेंच ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह इस मुद्दे पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य विभागों के सचिवों को एक प्रेजेंटेशन दें। बेंच ने कहा कि स्वास्थ्य सचिव विशेषज्ञों की मदद और सलाह लेकर इस विषय पर उचित फैसला ले सकते हैं।सुनवाई के दौरान सीजेआई ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, क्या आपको लगता है कि जनहित याचिकाओं (पीआईएल) को विदेश से फंडिंग नहीं मिलती? क्या आप ऐसा सोचते हैं? शीर्ष कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को संबंधित सरकारी अधिकारियों के पास जाकर अपनी बात रखनी चाहिए। सीजेआई सूर्य कांत ने कहा, हम इस विषय के विशेषज्ञ नहीं हैं, फिर हम क्यों यह दिखावा करें कि हमें चिकित्सा विज्ञान आता है।सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ब्लड बैंकों में कौन-सा परीक्षण किया जाना चाहिए, इसका फैसला क्षेत्र के विशेषज्ञ ही कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि इस विषय में विशेष ज्ञान न होने के कारण वह याचिका में मांगे गए निर्देश जारी नहीं कर सकती। बेंच ने यह भी कहा कि याचिका में जो राहत मांगी गई है, उससे वित्तीय बोझ भी पड़ेगा और हर राज्य की अपनी आर्थिक सीमाएं होती हैं।ये भी पढ़ें: ‘महिलाओं को कोई काम नहीं देगा’: पीरियड्स लीव पर CJI की टिप्पणी, अनिवार्य छुट्टी की याचिका पर सुनवाई से इनकार इससे पहले 25 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में और जानकारी मांगी थी। कोर्ट ने पूछा था कि पूरे देश के सरकारी अस्पतालों में एनएटी परीक्षण कराने की लागत कितनी होगी और क्या यह सुविधा उपलब्ध है। यह परीक्षण एचआईवी और हेपेटाइटिस जैसे ट्रांसफ्यूजन से फैलने वाले संक्रमणों का पता लगाने के लिए किया जाता है।बेंच ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ए वेलन से कहा था कि वे यह भी बताएं कि एनएटी परीक्षण कराने में कितना खर्च आएगा और क्या सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा मौजूद है, ताकि गरीब लोग भी इसका लाभ उठा सकें। इस याचिका में ‘सर्वेशम मंगलम फाउंडेशन’ने केंद्र सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार बनाया था।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें सभी ब्लड बैंकों में अनिवार्य रूप से न्यूक्लिक एसिड प्रवर्धन परीक्षण (एनएटी) लागू करने की मांग की गई थी, ताकि मरीजों को संक्रमण मुक्त खून मिल सके। सुनवाई के दौरान शीर्ष कोर्ट ने कहा कि हम यह दिखावा क्यों करें कि हमें चिकित्सा विज्ञान की पूरी जानकारी है।

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