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Meta Description: हालात: News: हालात: औलाद के बेरोजगार होने पर बुजुर्गों में बढ़ जाता है अवसाद का खतरा; आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा में गहरा संबंध – जानिए क्या है पूरा मामला और ताजा अपडेट्स।
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हालात:: मुख्य समाचार और अपडेट
हालात:: भारत में बुजुर्गों के अवसाद में जाने की एक बड़ी वजह उनकी वयस्क औलादों का बेरोजगार होना है। यह खुलासा अनुदैर्ध्य वृद्धावस्था (एलएएसआई) के सर्वे में हुआ है। एलएएसआई के तहत इकट्ठा किए गए आंकड़ों में सामने आया है कि औलादों की बेराजगारी में बुजुर्ग माता-पिता में अवसाद का खतरा 12 फीसदी अधिक बढ़ जाता है।
जर्नल सोशल साइंस एंड मेडिसिन में छपे इस शोध अध्ययन के नतीजों से यह भी पता चला है कि बुजुर्गों की भलाई और बच्चों की नौकरी के बीच का जुड़ाव उन परिवारों में और गहरा हो जाता है जहां माता-पिता की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा बच्चों पर अधिक निर्भर होती है, यानी जहां बच्चों का सहारा माता-पिता के लिए अधिक जरूरी होता है, ऐसे परिवारों में उनकी बेरोजगारी का असर भी अधिक गंभीर होता है। स्वीडन की उमिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं सहित अन्य शोधकर्ताओं ने देखा कि जो बुज़ुर्ग सामाजिक रूप से सक्रिय रहते हैं, वे मानसिक तौर से भी अधिक सेहतमंद होते हैं। इसके उलट अकेले या सामाजिक रूप से अलग-थलग रहने वाले बुजुर्गो में अवसाद का खतरा अधिक पाया गया।स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2017-18 में शुरू किए इस सर्वे में पूरे देश में 45 साल और उससे अधिक उम्र के 73,000 से अधिक लोगों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने बताया कि देश में भले ही युवा आबादी अधिक है, लेकिन भारत दुनिया में दूसरे सबसे अधिक बुजुर्गों की आबादी का घर है। इसके बावजूद देश में अभी तक सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली नहीं है और केवल 60 साल और उससे अधिक उम्र के 18 फीसदी बुज़ुर्गों के पास ही स्वास्थ्य बीमा है।भारत की पारिवारिक व्यवस्था में बच्चों का माता-पिता की देखभाल एक सामान्य परंपरा है। ऐसे में बुज़ुर्ग आर्थिक और स्वास्थ्य मदद के लिए अपने बच्चों पर काफी निर्भर रहते हैं। यही वजह है कि जब बच्चे नौकरी खो देते हैं, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। उमिया विश्वविद्यालय के जनसांख्यिकी और उम्र बढ़ने के शोध केंद्र के शोधकर्ता ऋषभ त्यागी के मुताबिक, भारत में पीढ़ियां आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं। जब युवा पीढ़ी रोजगार खोती है, तो बुजुर्गों की स्थिति कमजोर हो जाती है, खासकर तब, जब वे सामाजिक रूप से सक्रिय नहीं होते। शोधकर्ताओं के मुताबिक, वयस्क औलादों की बेरोजगारी से माता-पिता के अवसाद का खतरा 3.14 फीसदी अंक (लगभग 12.48% वृद्धि) तक बढ़ जाता है।शोध में सामने आया कि पहले बेटे की बेरोजगारी का असर माता-पिता पर बेटियों के मुकाबले ज्यादा होता है। यह भारत की सामाजिक मान्यताओं को दर्शाता है, जहां बड़े बेटे से बुज़ुर्गों की देखभाल की उम्मीद की जाती है। हालांकि, इस पूरे परिदृश्य में एक सकारात्मक पहलू सामने आया कि सामाजिक जुड़ाव एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। जो बुजुर्ग सामाजिक गतिविधियों में भाग लेते हैं, उनमें अवसाद का खतरा कम होता है, भले ही उनके बच्चे बेरोजगार हों। इसके विपरीत, जो लोग सामाजिक रूप से सक्रिय नहीं हैं, उनके लिए बच्चों की बेरोजगारी का असर और ज्यादा गंभीर हो जाता है।
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