CRPF Day Parade: आतंकी-नक्सली ही नहीं, पड़ोसी मुल्क चीन-पाकिस्तान भी देख चुके हैं ‘सीआरपीएफ’ जांबाजों की वीरता

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CRPF Day Parade: आतंकी-नक्सली ही नहीं, पड़ोसी मुल्क चीन-पाकिस्तान भी देख चुके हैं 'सीआरपीएफ' जांबाजों की वीरता: ताजा अपडेट

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Meta Description: CRPF News: CRPF Day Parade: आतंकी-नक्सली ही नहीं, पड़ोसी मुल्क चीन-पाकिस्तान भी देख चुके हैं ‘सीआरपीएफ’ जांबाजों की वीरता – जानिए क्या है पूरा मामला और ताजा अपडेट्स।

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CRPF: मुख्य समाचार और अपडेट

CRPF: दुनिया का सबसे बड़ा केंद्रीय अर्धसैनिक बल ‘सीआरपीएफ’, शनिवार को अपना 87वां ‘स्थापना दिवस परेड’ आयोजित कर रहा है। वर्ष 1939 में सीआरपीएफ का गठन क्राउन रिप्रेजेंटेटिव पुलिस के नाम से किया गया था। इस बल का वर्तमान नया स्वरूप और ध्वज देने का काम देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया था। सीआरपीएफ एक ऐसा बल है, जिसके जांबाजों की वीरता पड़ोसी मुल्क ‘चीन’ और ‘पाकिस्तान’ भी देख चुके हैं। सीआरपीएफ ने लद्दाख के ‘होट स्प्रिंग’ में जहां चीन को अपनी वीरता का लोहा मनवाया था, वहीं ‘कच्छ के रण’ में पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया था। सरदार पटेल ने सीआरपीएफ की स्थापना की और ध्वज प्रदान किया था। साथ ही उन्होंने इस बल के चार्टर को भी बखूबी चिह्नित करने का काम किया। सरदार पटेल के ही दिखाए गए रास्ते पर सीआरपीएफ ने इतनी लंबी गौरवशाली यात्रा पूरी की है।

कुछ वर्षों से केंद्रीय अर्धसैनिक बलों ‘सीएपीएफ’ के स्थापना दिवस मनाने को लेकर एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। खासतौर पर देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल ‘सीआरपीएफ’, देश की प्रथम रक्षा पंक्ति कही जाने वाली ‘बीएसएफ’ और हिमवीरों का बल यानी ‘आईटीबीपी’ के स्थापना दिवस की तिथियों में बदलाव किया जा रहा है। ‘सीआरपीएफ’ का स्थापना दिवस 19 मार्च को मनाया जाता है, लेकिन इस बार 21 फरवरी को मनाया जा रहा है। सीआरपीएफ के 87वें स्थापना दिवस की परेड गुवाहाटी में आयोजित की गई है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने बतौर मुख्य अतिथि स्थापना दिवस परेड की सलामी ली है।लद्दाख के ‘होट स्प्रिंग’ में सीआरपीएफ के जांबाज सोनम वांग्याल ने वीरता का परिचय दिया था। 1959 में चीनी सैनिकों ने लेह-लद्दाख के कई इलाकों में घुसपैठ की थी। भले ही भारतीय नायकों की संख्या मुट्ठीभर रही, लेकिन उन्होंने चीन की फौज का जमकर मुकाबला किया था। लद्दाख में चीनी फौज के सामने डीएसपी करमसिंह (आईटीबीएफ) ने मिट्टी हाथ में उठा कर कहा था, ये जमीन हमारी है। इसके बाद चीन की फौज की तरफ से एक पत्थर फेंका गया। बतौर वांगयाल, जब चीन की इस हरकत का विरोध किया गया तो उनके सैनिकों ने चारों तरफ से फायरिंग शुरू कर दी। भारत के कई जवान शहीद हुए। भारत के उन्हीं शहीदों के सम्मान में हर वर्ष 21 अक्तूबर को देश में पुलिस संस्मरण दिवस मनाया जाता है।21 अक्तूबर 1959 का दिन और 16,300 फुट की ऊंचाई पर भारतीय इलाके में घुसपैठ करने वाली चीन की फौज ने हमारे जवानों को धोखे से मार डाला था। उस वक्त लद्दाख में कई फुट बर्फ पड़ी थी। तब वांगयाल अकेले बच गए थे। उनके सामने दस जवानों के शव पड़े थे। शवों को लाने के लिए उन्होंने लकड़ी और तिरपाल का स्ट्रेचर बनाया। वे अपने जवानों के शवों को घोड़ों की मदद से खींचते हुए सिलुंग नाले के रास्ते होट स्प्रिंग (लेह में चीनी सैनिकों के कब्जे से मुक्त कराई गई भारतीय चौकी) तक ले आए। शव इतने क्षत-विक्षत हो चुके थे कि उन्हें आगे ले जाना मुश्किल था। वांगयाल ने वहीं पर लकड़ियां एकत्रित कर अपने साथियों का अंतिम संस्कार कर दिया।1962 की लड़ाई से पहले 1959 में चीनी सैनिकों ने लेह-लद्दाख के कई इलाकों में घुसपैठ की थी। मुट्ठीभर जवानों को होट स्प्रिंग पर चौकी स्थापित करने का आदेश मिला। भारतीय जवान चौकी स्थापित करने में तो कामयाब हो गए, लेकिन अपने लापता साथियों की तलाश के दौरान सैकड़ों चीनी सैनिकों ने उन्हें निशाने पर ले लिया। दर्जनभर जवानों को धोखे से मार दिया गया। जो बच गए उन्हें हिरासत में ले लिया गया। सितम्बर 1959 में वांगयाल के दस्ते को होट स्प्रिंग, जिसके निकट चीनी फौज पहुंच चुकी थी, पर चौकी स्थापित करने का आदेश मिला। 70 जवानों की दो टुकड़ी बनाई गई। एक का नेतृत्व आईटीबीएफ के डीएसपी करमसिंह और दूसरी टुकड़ी की कमान एसपी त्यागी को सौंपी गई। चौकी को चीनी कब्जे से मुक्त करा लिया गया, लेकिन सोनम सहित दर्जनभर जवान पकड़े गए। कुछ दिन बाद सोनम और उनके साथी चुशुल एयरपोर्ट के निकट रिहा कर दिए गए। बाद में पता चला कि डीएसपी करमसिंह की टुकड़ी के सात जवान बेस कैंप पर नहीं पहुंचे।20 अक्तूबर को डीएसपी कर्मसिंह के नेतृत्व में सोनम सहित करीब दो दर्जन जवान अपने लापता साथियों की तलाश में निकल पड़े। उन्हें रास्ते में चीनी सैनिकों और उनके घोड़ों के चिह्न दिखाई दिए। इससे पहले कि वे कोई रणनीति बनाते, एकाएक चीनी सैनिकों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। करमसिंह ने मिट्टी हाथ में उठाकर कहा, यह जमीन हमारी है। चीनी सैनिकों ने भी वैसा ही किया। खास बात है कि अगले दिन दोपहर तक यह खेल चलता रहा। लड़ाई का बहाना एक पत्थर बना, जिसे चीनी फौज के कमांडर ने फेंका था। जब भारतीय जवानों ने इसका विरोध किया तो उन पर चारों तरफ से फायरिंग शुरू कर दी गई। बर्फ में हथियार जवाब दे चुके थे। उस लड़ाई में दस जवान शहीद हुए। डीएसपी करमसिंह सहित कई सिपाही चीनी सैनिकों की गिरफ्त में आ गए। सिपाही मक्खन लाल जो कि उस वक्त घायल हुआ था, आज तक वापस नहीं लौटा। अन्य जवानों को बाद में रिहा कर दिया गया, मगर उनमें मक्खन नहीं था।1965 में सीआरपीएफ की छोटी सी टुकड़ी ने पाकिस्तान की इन्फेंट्री, जिसने गुजरात स्थित कच्छ के रण में ‘टाक’ और ‘सरदार पोस्ट’ पर हमला किया, को मुंह तोड़ जवाब दिया था। दुनिया हैरान थी कि अर्धसैनिक बल की सेकेंड बटालियन की दो कंपनियों (करीब 150 जवान) ने पाकिस्तानी सेना की 51 वीं ब्रिगेड के 35 सौ सैनिकों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। पाकिस्तान ने 14 घंटे में तीन बार हमले का प्रयास किया, लेकिन सीआरपीएफ के बहादुर जवानों ने उनके मंसूबे पूरे नहीं होने दिए। पाकिस्तान के पास तोपें भी थी, जबकि सीआरपीएफ जवानों के पास सामान्य हथियार थे।नतीजा, पाकिस्तान के 34 सैनिक मारे गए, जिनमें दो अफसर भी शामिल थे। चार को जिंदा पकड़ लिया गया। 1965 में जब पाकिस्तान ने यह हमला किया तो उस वक्त बीएसएफ की स्थापना नहीं हुई थी। यह एकमात्र ऐसा युद्ध था, जिसमें पुलिस बल की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन की विशाल ब्रिगेड को घुटने टेक वापस लौटने पर मजबूर कर दिया। सीआरपीएफ के अदम्य शौर्य, रण कौशल और अद्वितीय बहादुरी के चलते हर साल 9 अप्रैल को शौर्य मनाया जाता है।70 के दशक के पश्चात जब उग्रवादी तत्वों द्वारा त्रिपुरा और मणिपुर में शांति भंग की गई तो वहां सीआरपीएफ बटालियनों को तैनात किया गया था। इसी दौरान ब्रह्मपुत्र घाटी में भी अशांति थी। सीआरपीएफ की ताकत को न केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल्कि संचार तंत्र व्यवधान मुक्त रखने के लिए भी शामिल किया गया। 80 के दशक में जब पंजाब में आतंकवाद छाया हुआ था, तब राज्य सरकार ने बड़े स्तर पर सीआरपीएफ की तैनाती की मांग की थी। मौजूदा समय में यह बल, 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने की मुहिम में लगा है।मौजूदा समय में यह बल अपने महानिदेशालय, 4 जोनल मुख्यालय, 21 प्रशासनिक सेक्टर, 2 परिचालनिक सेक्टर, 39 प्रशासनिक रेंज, 17 परिचालनिक रेंज, 43 ग्रुप केंद्र, 22 प्रशिक्षण संस्थान, 100 बिस्तरों वाले चार संयुक्त अस्पताल, 50 बिस्तरों वाले 18 संयुक्त अस्पताल, 6 फील्ड अस्पताल, 3 सीडब्लूएस, 7 एडब्लूएस, 201 सामान्य ड्यूटी बटालियन, 6 वीआईपी सुरक्षा बटालियन, 6 महिला बटालियन, 16 आरएएफ बटालियन, 10 कोबरा बटालियन, 7 सिग्नल बटालियन, 1 वीआईपी सुरक्षा ग्रुप और 1 स्पेशल ड्यूटी ग्रुप से युक्त एक बड़ा संगठन है। तीन लाख से अधिक की संख्या वाला यह बल, हर जगह देश की शांति और सुरक्षा के लिए काम कर रहा है।

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