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Meta Description: Health: News: Health: बच्चे हो रहे एआई अरेस्ट, घट रही सीखने-समझने की क्षमता; ये 5 संकेत दिखें तो तुरंत हो जाएं अलर्ट – जानिए क्या है पूरा मामला और ताजा अपडेट्स।
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एसएन की ओपीडी में हर महीने 25-30 ऐसे मामले आ रहे हैं जिसमें मोबाइल की लत के कारण बच्चों की पढ़ाई और अन्य कार्य प्रभावित हो रहे हैं। बच्चों की काउंसलिंग करने के साथ ही परिजन को बचाव के बारे में भी बताते हैं। गाजियाबाद में ऑनलाइन गेम की लत के कारण तीन नाबालिग बहनों की आत्महत्या की घटना झकझोरने वाली है। ऐसे में बच्चों के लिए सोशल मीडिया गाइडलाइन बनाना बेहद जरूरी हो गया है। विज्ञापन विज्ञापन
Health:: घटना का पूरा विवरण
एसएन की ओपीडी में हर महीने 25-30 ऐसे मामले आ रहे हैं जिसमें मोबाइल की लत के कारण बच्चों की पढ़ाई और अन्य कार्य प्रभावित हो रहे हैं। बच्चों की काउंसलिंग करने के साथ ही परिजन को बचाव के बारे में भी बताते हैं। गाजियाबाद में ऑनलाइन गेम की लत के कारण तीन नाबालिग बहनों की आत्महत्या की घटना झकझोरने वाली है। ऐसे में बच्चों के लिए सोशल मीडिया गाइडलाइन बनाना बेहद जरूरी हो गया है। आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभागाध्यक्ष डॉ. विशाल सिन्हा का कहना है कि सोशल मीडिया के लंबे समय तक उपयोग करने से दिमाग के न्यूराेट्रांसमीटर्स बिगड़ने लगते हैं। इससे नींद, सीखने-समझने की क्षमता और याददाश्त प्रभावित हो रही है। चंद सेकंड की रील देखने के आदी होने के कारण बच्चे ज्यादा समय के कार्याें से ऊबने लगते हैं। बच्चों में धैर्य की कमी हो जाती है। यहां तक कि स्कूल में लगने वाली 40 मिनट की कक्षा में भी मन नहीं लगता है।
बच्चों में बढ़ रहे मानसिक विकार
मानसिक स्वास्थ्य संस्थान एवं चिकित्सालय के निदेशक प्रो. दिनेश राठौर का कहना है कि गेम, रील समेत अन्य कंटेंट व्यावसायिक हैं। इसके लिए वे एडवांस, टारगेट बेस्ड कंटेंट लेकर आते हैं। बच्चे इसकी गिरफ्त में आकर घंटों इसका इस्तेमाल करने लगते हैं। इससे एआई अरेस्ट की स्थिति बन रही है। बच्चों में मानसिक विकार और हादसों की संख्या तेजी से बढ़ी है। संस्थान की ओपीडी और हेल्पलाइन नंबर की बात करें तो हर महीने 30-40 मामले ऐसे आ रहे हैं जिसमें बच्चे रील, गेम, सोशल मीडिया की लत से प्रभावित होते हैं। गुस्सा करने के साथ सामान फेंकने और अकेले रहने की आदत बढ़ रही है। बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने या फिर सख्त गाइडलाइन बनाने की जरूरत है।
Health:: निष्कर्ष और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी
रोशनी से आंखें कमजोर, सिर में रहता है दर्द
एसएन मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग की डॉ. शेफाली मजूमदार ने बताया कि मोबाइल-लैपटॉप पर घंटों समय बिताने से बच्चों की आंखों की रोशनी कमजोर हो रही है। यहां तक कई बार चश्मा लगाने के बाद भी नजर स्थिर नहीं रह पाती है। मोबाइल की रंग-बिरंगी रोशनी और छोटी स्क्रीन से रिफ्लेक्टर एरर हो रहा है। नसों पर अत्यधिक दबाव पड़ने से सिर में दर्द रहता है। पलक कम झपकने के कारण आंखों में सूखापन, करकराहट और दर्द की परेशानी भी मिल रही है। ओपीडी में ऐसे 15 फीसदी बच्चे आते हैं।
बच्चों में ये बदलाव दिखें तो हो जाएं सतर्क
1- रोजाना एक घंटे से ज्यादा मोबाइल-लैपटॉप देखना।
2- खेलकूद समेत अन्य कार्य में रुचि कम हो जाना।
3- परिजन से बातचीत कम करना, एकाकी होना।
4- टोकाटाकी पर गुस्सा करना, तेज आवाज में बोलना, सामान फेंकना।
5- शैक्षणिक क्षमता में गिरावट आना, चिड़चिड़ा होना।
मानसिक स्वास्थ्य संस्थान का 24 घंटे का हेल्पलाइन नंबर : 14416
जरूरी होने पर ही हो ऑनलाइन क्लास
सीबीएसई के शहर प्रभारी डॉ. आरके पांडे ने बताया कि पढ़ाई के बहाने मोबाइल का बच्चे अन्य कार्याें के लिए उपयोग कर रहे हैं। इसकी लत लगने के बाद बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है। ऐसे में स्कूल संचालकों से अनुरोध है कि बच्चों को बेहद जरूरी होने पर ही ऑनलाइन क्लास-होमवर्क देना चाहिए।
मोबाइल बिना भी हो सकती है पढ़ाई
अप्सा सचिव डॉ. गिरधर शर्मा का कहना है कि मोबाइल बिना भी पढ़ाई हो सकती है। सिर्फ सूचना के लिए ही व्हाटसएप ग्रुप पर जानकारी साझा करते हैं। ऑनलाइन कक्षाएं और होमवर्क से बचा जाता है। सोशल मीडिया की लत जानलेवा हो रही है। ऐसे में बच्चों के लिए इसे पाबंद करना चाहिए।
बच्चों के लिए बैन हो सोशल मीडिया
नप्सा अध्यक्ष संजय तोमर का कहना है कि तकनीक जरूरी है लेकिन बच्चे मोबाइल-लैपटॉप के फेर में समय बरबाद कर रहे हैं। ये गेम समेत अन्य उत्तेजक सामग्री के शिकार हो रहे हैं। इससे बच्चों की दैनिक गतिविधियां भी प्रभावित हो रही हैं। ऐसे में बच्चों के लिए इसे बैन कर देना चाहिए।
संबंधित जानकारी (Background):
इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए उत्तर प्रदेश (UP News) का विकिपीडिया पेज देखें।
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