उत्तर-प्रदेश के लखनऊ में एकता और भाईचारे की एक खूबसूरत मिसाल देखने को मिली है। स्थानीय मुस्लिम समाज के लोगों ने एक-साथ मिलकर दरगाह पर चादर चढ़ाई और संत प्रेमानंद महाराज के शीघ्र स्वस्थ होने की दुआ की।
घटना की पृष्ठभूमि
लखनऊ के एक प्रमुख दरगाह में मंगलवार को मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों ने पूजा-अर्चना साझा की, जहाँ उन्होंने चादर चढ़ा कर प्रेमानंद महाराज की सेहत के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। इस दौरान उन्होंने कहा कि “कौन हिंदू, कौन मुसलमान” की बात नहीं-यह हमारी एकता का प्रमाण है।
लोगों ने बताया कि प्रेमानंद महाराज धार्मिक भेद भाव से ऊपर उठकर समाज को जोड़ने का काम करते हैं और उन्होंने इस अवसर पर इंसानियत व प्रेम का संदेश दिया।
क्या-क्या हुआ
- दरगाह पर बड़ी संख्या में लोग जुटे और चादर चढ़ाई गई।
- मुस्लिम प्रतिनिधियों ने कहा कि प्रेमानंद महाराज जैसे संत समाज में भाईचारे की भावना जगाते हैं।
- एक स्थानीय युवक ने कहा:
“कौन हिंदू, कौन मुसलमान, तू पढ़ ले मेरी गीता, मैं पढ़ लूं तेरा कुरान।” - यह आयोजन सामाजिक सौहार्द का संदेश बनकर उभरा—धर्म से ऊपर उठकर इंसानियत को महत्व दिया गया।
सामाजिक-भावनात्मक असर
इस प्रकार के कार्यक्रम समाज में सकारात्मक असर डालते हैं:
- यह हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूती देता है।
- स्थानीय स्तर पर सामाजिक समरसता का वातावरण बनता है।
- धार्मिक संगठनों और सामाजिक संस्थाओं को मिलकर काम करने का प्रेरणा-स्तर बढ़ता है।
- मीडिया व सोशल प्लेटफार्म पर ऐसे उदाहरण बढ़-चढ़कर दिखाई देते हैं जो सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देते हैं।
आगे क्या?
अब इस तरह की पहल को बढ़ावा देना जरूरी है — स्थानीय-समुदाय-स्तर पर और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं द्वारा मिलकर इस तरह के एकता-कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। इस तरह प्रेमानंद महाराज जैसे विचारक-संतों का समर्थन समाज को सकारात्मक दिशा देगा।
निष्कर्ष
लखनऊ में जब मुस्लिम समाज ने दरगाह पर चादर चढा कर प्रेमानंद महाराज की स्वास्थ्य-मांग की, तो यह सिर्फ एक धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि सामाजिक-संदेश बन गई — एकता, भाइचारे और इंसानियत की। इस तरह के अनुभव हमें याद दिलाते हैं कि धर्म हमें बांटने का माध्यम नहीं बल्कि जोड़ने का उपकरण हो सकता है।

