Navratri 2026: लखीमपुर के संकटा देवी मंदिर में उमड़ी भक्तों की भीड़, जानिए यहां का इतिहास और मान्यता

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Navratri 2026: लखीमपुर के संकटा देवी मंदिर में उमड़ी भक्तों की भीड़, जानिए यहां का इतिहास और मान्यता: ताजा अपडेट

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Navratri: पौराणिक इतिहास और स्थापना की कथा

स्थानीय मान्यता और पुराणों से जुड़ी कथा के अनुसार यह मंदिर द्वापर युग (महाभारत काल) का है। महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणी और पांडवों के साथ पशुपतिनाथ (नेपाल) दर्शन के लिए जा रहे थे। रास्ते में यह क्षेत्र (तब घने वन और बड़े जलाशयों से घिरा सुंदर स्थान) बहुत भाया। रुक्मिणी ने यहां रुककर पूजा-अर्चना करने की इच्छा जताई।

श्रीकृष्ण ने उन्हें यहां ठहराकर पांडवों के साथ यात्रा पूरी की। लौटते समय उन्होंने एक विशाल जलाशय के किनारे माता लक्ष्मी, माता सरस्वती और माता दुर्गा की पाषाण प्रतिमाएं स्थापित कीं। पांडवों के साथ विधि-विधान से पूजा की गई।

पुजारी के मुताबिक भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि सच्चे मन से मां के दर्शन करने पर हर प्रकार के संकट, कष्ट, बाधा, रोग और आर्थिक समस्या दूर हो जाती है। मनोकामनाएं पूरी होती हैं, सुख-समृद्धि, सौभाग्य और सुरक्षा मिलती है। विवाह, मुंडन, अन्नप्राशन, नामकरण, गृह प्रवेश आदि सभी शुभ संस्कार मां संकटा के दर्शन के बाद ही शुरू किए जाते हैं। नवविवाहित जोड़े भी पहले यहां माता के चरणों में नमन करते हैं। खीरी और आसपास के क्षेत्रों में यह कुलदेवी मानी जाती है। बिना उनके दर्शन के कोई शुभ कार्य अधूरा माना जाता है।

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