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Meta Description: Supreme News: Supreme Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट में तदर्थ जज हुए नियुक्त, कॉलेजियम ने पांच रिटायर्ड जजों को दी मंजूरी – जानिए क्या है पूरा मामला और ताजा अपडेट्स।
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Supreme: मुख्य समाचार और अपडेट
Supreme: न्याय व्यवस्था में लंबित मामलों का बोझ कम करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए पांच रिटायर्ड जजों को तदर्थ जज के तौर पर नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 224-A के तहत दो साल की अवधि के लिए होगी।
तीन फरवरी की बैठक में प्रस्ताव को मंजूरी दी गई।
Supreme: घटना का पूरा विवरण
इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए पांच रिटायर्ड जजों के नाम पर मुहर
सभी को इलाहाबाद हाईकोर्ट में तदर्थ जज बनाया जाएगा।
नियुक्ति की अवधि दो साल तय की गई है।
Supreme: निष्कर्ष और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी
कॉलेजियम ने साफ किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित मामलों के भारी दबाव को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। तदर्थ जज अस्थायी तौर पर बैठकर मामलों की सुनवाई करेंगे। इससे पुराने केसों की तेजी से सुनवाई हो सकेगी। यह प्रावधान संविधान में पहले से मौजूद है, लेकिन इसका उपयोग बहुत कम बार किया गया है। अब बढ़ते लंबित मामलों को देखते हुए इसे सक्रिय रूप से लागू किया जा रहा है।संविधान का अनुच्छेद 224-A हाईकोर्ट में तदर्थ जज नियुक्त करने का अधिकार देता है। इसके तहत किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, किसी रिटायर्ड जज को दोबारा उसी या किसी अन्य हाईकोर्ट में अस्थायी जज के रूप में बैठने का अनुरोध कर सकते हैं। इन जजों को नियमित जज की तरह ही अधिकार मिलते हैं। इसका मकसद अदालतों में काम का बोझ कम करना है।
लंबित मामलों पर सुप्रीम कोर्ट पहले क्या कह चुका है?
सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2021 में हाईकोर्टों में करीब 57 लाख लंबित मामलों को डॉकेट एक्सप्लोजन यानी मामलों की बाढ़ बताया था। तब अदालत ने इस निष्क्रिय पड़े संवैधानिक प्रावधान को सक्रिय किया था और रिटायर्ड जजों की तदर्थ नियुक्ति का रास्ता साफ किया था। इसके लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए गए थे, ताकि नियुक्तियां तय नियमों के तहत हों और लंबित मामलों की सुनवाई तेज हो।
तदर्थ जजों की सीमा क्या तय की गई थी?
पिछले साल 30 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्टों को तदर्थ जज नियुक्त करने की अनुमति दी थी। साथ ही यह भी तय किया था कि ऐसे जजों की संख्या अदालत की कुल स्वीकृत जज संख्या के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। इसका उद्देश्य यह है कि अस्थायी नियुक्ति सहायक भूमिका निभाए, लेकिन नियमित न्यायिक ढांचे का संतुलन भी बना रहे।
संबंधित जानकारी (Background):
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