जिधर अल्पसंख्यक वही सुल्तान: केरल के 45% वोट की खामोशी में छुपी है चाबी, दो की लड़ाई में तीसरी ताकत का दांव

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जिधर अल्पसंख्यक वही सुल्तान: केरल के 45% वोट की खामोशी में छुपी है चाबी, दो की लड़ाई में तीसरी ताकत का दांव: ताजा अपडेट

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जिधर: मुख्य समाचार और अपडेट

जिधर: मुस्लिम और ईसाई समुदायों की यह भारी-भरकम हिस्सेदारी केरल को देश के सबसे दिलचस्प चुनावी मुकाबले में बदल देती है, जहाँ वोटों का मामूली झुकाव भी बड़े-बड़े दिग्गजों के समीकरण बिगाड़ सकता है। केरल की कुल आबादी में लगभग 26.60 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जिनका सबसे गहरा प्रभाव मालाबार क्षेत्र के मलप्पुरम, कोझिकोड और कासरगोड जैसे जिलों में दिखता है।वहीं, लगभग 18.40 प्रतिशत ईसाई आबादी मध्य केरल के कोट्टायम, इडुक्की और एर्नाकुलम में निर्णायक भूमिका में है। पारंपरिक रूप से कांग्रेस की अगुवाई वाला यूडीएफ इन वोटों का स्वाभाविक दावेदार माना जाता रहा है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में वामपंथियों की पैठ और भाजपा की सक्रियता ने इस किले में दरारें डाल दी हैं।मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला वामपंथी गठबंधन (एलडीएफ) खुद को अल्पसंख्यक हितों के सबसे बड़े रक्षक के रूप में पेश कर रहा है। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और एनआरसी जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाकर लेफ्ट ने मुस्लिम युवाओं और बुद्धिजीवियों के बीच अपनी जगह बनाई है। साथ ही, केरल कांग्रेस (मणि) को अपने साथ जोड़कर विजयन ने ईसाई गढ़ों में भी सेंध लगाने की कोशिश की है।कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूडीएफ के लिए इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) आज भी सबसे मजबूत खंभा है। इसके अलावा, जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों का समर्थन भी यूडीएफ के पक्ष में हवा बना रहा है। ईसाई वोट बैंक को साधे रखने के लिए कांग्रेस अब खेत और पेट की राजनीति का सहारा ले रही है।केरल में तीसरी ताकत बनने की जद्दोजहद में जुटी भाजपा का पूरा ध्यान इस बार ईसाई समुदाय पर टिका है। पार्टी लव जिहाद और भूमि विवाद जैसे मुद्दों के जरिये मुस्लिम और ईसाई वर्गों के बीच पैदा हुई दूरी का लाभ उठाना चाहती है। प्रधानमंत्री मोदी की पादरियों और बिशपों से मुलाकातें और ‘स्नेह यात्रा’ जैसे अभियान इसी रणनीति का हिस्सा हैं। हालांकि, मणिपुर की हिंसा और देश के अन्य हिस्सों में ईसाई मिशनरियों पर होने वाले हमलों की खबरें भाजपा की राह में सबसे बड़ी रुकावट बनकर उभरी हैं।फिलहाल केरल का सियासी माहौल कई दिशाओं में बंटा हुआ नजर आ रहा है। अल्पसंख्यक वोट बैंक पूरी तरह खामोश है, लेकिन यह खामोशी ही किसी के लिए सत्ता का रास्ता खोलेगी तो किसी के लिए हार का सबब बनेगी। जैसे-जैसे मतदान का दिन करीब आ रहा है, रबर की कीमतों से लेकर सीएए तक के मुद्दे एक ठोस जनादेश की शक्ल लेते जा रहे हैं।

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