आज़म ख़ान… वो नाम जो सिर्फ़ सियासत का नहीं बल्कि एक तहरीक का दस्तखत है।वो शख़्सियत जिसके सीने में आने वाली नस्लों के मुस्तकबिल के हसीन ख़्वाब पलते रहे — ऐसे ख़्वाब जिनमें पंचर बनाने वाले, दस्तकार, मज़दूर, मज़लूम और माज़ूर तबक़ात के बच्चों को तालीम और तरक़्क़ी का हक़ हासिल हो।वो ख़्वाब जिनमें इस मुल्क की पिछड़ी, दलित और मुसलमान आबादी को भी इस वतन की तरक़्क़ी का बराबर का हिस्सा मिले।आज जब जनाब अखिलेश यादव ने आज़म साहब को क़लम तोहफ़े में दी, तो ये सिर्फ़ एक तक़रीब नहीं थी —बल्कि ये इज़हार था कि अखिलेश साहब आज़म ख़ान के उन ख़्वाबों की ताबीर में उनके हमराह हैं।ये पैग़ाम था कि तालीम और इंसाफ़ की मशाल बुझने नहीं दी जाएगी।आज के दौर में जब सियासतदान अपने मक़ासिद के लिए दल बदलते हैं जैसे लोग कपड़े बदलते हैं, ऐसे वक़्त में मुलायम सिंह यादव और आज़म ख़ान की मोहब्बत, वफ़ादारी और खुलूस हमें सिखाते हैं कि असल सियासत वफ़ा और एहसास की होती है।उनका रिश्ता एक मिसाल है — जो एक नस्ल से दूसरी नस्ल तक गर्मी, सुकून और इज़्ज़त की दौलत पहुंचाता है।ये सिलसिला मुलायम और आज़म से शुरू होकर अखिलेश और अब्दुल्लाह आज़म तक जारी है —और यही है असली सियासी विरासत, जो इंसानियत, वफ़ादारी और कुर्बानी की बुनियाद पर क़ायम है।चश्म-ए-बद्दूर!ये रिश्ते हमें याद दिलाते हैं कि सियासत सिर्फ़ कुर्सी की नहीं, क़ौम और अदब की भी होती है —और जो अपने अक़ीदों से वफ़ा करता है, वही वक़्त की तख़्तनशीनी का हक़दार बनता है।
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